translation missing: en.general.search.loading
Insta Publishing | Book Details

Category : Non-Fiction

Rs. 149

SKU : BOOK20IP0083

Pages : 156

Available Now: Yes

  • Book Name: Sugandha Evam Anya Kahaniyan
  • Author Name: Sangameswaran Nurani
  • ISBN Code: 978-93-90636-14-5
  • Publish Date: 2021-03-24

अपनी बात अपनी यायावरी ज़िंदगी में मैंने बहुत से पड़ाव देखें हैं और हर पड़ाव पर अपने आस-पास बिखरी कुछ कहानियों के सूत्र भी स्वत: ही मिलते गये हैं, लेकिन जीवन की आपा-धापी में इन्हे गूँथने का किंचित अवकाश नहीं मिल पाया। कभी- कभी मुझे तो ऐसा भी लगा कि इस संग्रह कि हर कहानी अपने-आप में एक आईना है, जहां अपने अक्स हम चाहे तो ढूंढ भी सकते हैं। जबतक पंखुड़ियाँ बंद रहती है, प्रस्फुटित होते हुए पुष्पका सौंदर्य दृष्टिगोचर नहीं होता, वैसे ही अक्षरों और शब्दों से बुने हुए जीवन मूल्यों के चिरंतन-सत्य से अवगत होते हुए भी हम तबतक अनभिज्ञ ही रह जाते हैं, जबतक उनके अंतस में छिपी वेदना नहीं महसूस कर पाते। आज के तकनीक प्रधान युग में भी मानवीय संबेदनाओं के अगाध विस्तार की अनदेखी हम कदापि नहीं कर सकते, यही इस संग्रह की सभी रचनाओं का कथ्य और अभीष्ट भी है। कुछ कहानियों के अंश उद्धृत है; “फिर विप्लव सोचता, वह कितना बुजदिल है, इतने ही संघर्ष में हिम्मत हार बैठा। उसके पिता और दादा ने कैसे-कैसे दिन इसी कोलकाता में देखे है। उसके पिताजी बताते थे की 16 अगस्त 1946 को जब उनके पिता यानि विप्लव के दादाजी इसी फूल बागान में अपनी दुकान पर बैठे ग्राहको से लेन-देन कर रहे थे, तभी ज़ोरों का हल्ला हुआ। दंगे की सुगबुगाहट तो पिछले एक माह से थी पर आज तो मानों विस्फोट ही हो गया। मुहल्ले क्या पूरे कलकत्ता में दंगा फैल गया था, मारो-काटो की आवाज़े लगातार आ रही थी, जबतक उनके पिताजी कुछ समझ पाते, उन्हे दिखाई पड़ा कि बहुत से लोग, जिनके हाथों में तलवारें, भाले, लाठियां और न जाने क्या-क्या हथियार थे, गली में दौड़ते चले आ रहे हैं, आप्तधर्म समझ वे काउंटर से कूद पड़े और फकत बनियान-लूँगी पहने दुकान एकदम से खुली छोड़ कर गलियों के रास्ते भागे। रोकड़-बक्स से रुपए भी नहीं उठा सके। किसी तरह गलियों से छिपते हुए उन्होने अपनी जान बचाई। फिर छिपते-छिपते हुए डेढ़ माह में अपने पुश्तैनी घर बिहारशरीफ जा पहुंचे। पूरे तीन महीने के बाद जब शांति कायम हुई तो वापस आये तो देखा कि दंगाई उनकी सारी दुकान ही लूट गये थे। खैर, फिर से तिनका-तिनका जोड़ कर उन्होने अपना नीड़ बसाया होगा। उन्हे तो किसी से कोई शिकायत नहीं रही, ईश्वर पर अडिग आस्था थी सो जीवन-पर्यंत बनी रही।......................................... 'कहानी एक रात की' से “विकास, तुम क्या समझ बैठे हो कि नारी आज भी इतनी परवश है, कि पुरुष जब चाहे उसे किसी के पैरों मे घुंघरू की तरह बांध दे और जब चाहे किसी दूसरे के पैरों में। तुम मेरी और मेरे परिवार की हकीकत जान ही रहे हो, जबसे मेरे पिताजी गुजर गये, एक योद्धा कि तरह लड़ती ही रही हूँ मैं, अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता करना नहीं सीखा मैंने। सारी वर्जनाएं तोड़कर तुमको मैंने चाहा था, लेकिन तुम ठहरे डरपोक, जमाने से लड़ना सीखा ही नहीं तुमने तो। क्या परिवार और क्या समाज – सभी से डरते रहोगे तो सारी ज़िंदगी डर में ही गुजर जायेगी।

संक्षिप्त-परिचय माता : स्व.( श्रीमती ) विद्या देवी पिता : स्व. रामदेव प्रसाद जन्म-तिथि : 19 अगस्त 1959 (विद्यालय-पंजिका के अनुसार) जन्म-स्थान : मधेपुरा (बिहार) शिक्षा : एम.ए., एल.एल.बी. स्थायी-पता : 'मधेपुरा-हाउस', हरनीचक, न्यू बाईपास रोड,पोस्ट-अनिसाबाद, पटना -800002(बिहार) अनुभव (क) एक बैंक-अधिकारी के रूप में 35 वर्षों तक भारत के विभिन्न राज्यों में कार्यानुभव। (ख) वित्त-मंत्रालय, भारत सरकार के ऋण वसूली अधिकरण में अधिकारी के रूप में 3 वर्षों का अनुभव। संप्रति : बिहार स्टेट बार कौंसिल,पटना से पंजीकृत अधिवक्ता। : स्वतंत्र लेखन और कमजोर वर्ग के लोगों को विधिक सहायता तथा अन्य सामुदायिक कार्य। प्रकाशनाधीन : ' A Hand Book on Debt Recovery Management through Legal Procedure.' ; अन्य : बैंक की गृह पत्रिका में सामयिक अंतराल पर रचनाएँ प्रकाशित।

Write a review




Review by Swami Krishnatmananda

Review posted on Facebook by Krishnatmananda Swami, Dayananda Ashram, Palakkad, Kerala: Those who want to understand Srimad Bhagavatam in its real Sense, this is the best book in English. Everybody will like the presentation. A real asset to all devotees.




We would love to speak to you before getting started.